पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी की सातवीं पुण्य तिथि के अवसर पर विद्यापति सेवा संस्थान के तत्वावधान में शनिवार को श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। मौके पर अटल बिहारी वाजपेयी के चित्र पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई।
संस्थान के प्रधान कार्यालय स्थित संगोष्ठी कक्ष में कार्यकारी अध्यक्ष डा बुचरू पासवान की अध्यक्षता में आयोजित श्रद्धांजलि सभा पूर्व प्रधानाचार्य डा विद्यानाथ झा ने कहा कि मिथिला और मैथिली के प्रति पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को विशेष लगाव था। खंडित मिथिला को एक सूत्र में बांधने के लिए कोसी नदी पर महासेतु के निर्माण और मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने में उनके योगदान को मिथिलावासी कभी नहीं भुला सकते।
अपने संबोधन में मैथिली अकादमी के पूर्व अध्यक्ष पं कमला कांत झा ने कहा कि वाजपेयी के सपनों का मिथिला बनाने के लिए संगठित होकर मिथिला-मैथिली के विकास की मांगों को सही प्लेटफार्म पर रखा जाना समय की जरूरत है। जबकि अष्टम अनुसूची में शामिल मैथिली भाषा के अधिकारों का गहन चिंतन करते हुए मिथिला को विकास की पटरी पर लाने के लिए हमें एकजुट होकर प्रयास करना होगा।

मणिकांत झा ने वाजपेयी के मिथिला, मैथिली व मैथिल से प्रेम व लगाव की चर्चा करते कहा कि जब हमें संवैधानिक अधिकार मिले हैं, तो प्राथमिक शिक्षा में मैथिली की पढ़ाई, धरोहर लिपि मिथिलाक्षर के संरक्षण व संवर्धन सहित राजकाज की भाषा मैथिली निश्चित रूप से बनेगी। लेकिन इसके लिए हमें समय रहते अपने अधिकार एवं कर्तव्य का बोध करना होगा। अमरनाथ चौधरी ने अपने संबोधन में बदले हालातों में मिथिला ने क्या खोया और क्या पाया, इस विषय पर विचार विमर्श करने की जरूरत पर बल दिया।
प्रो उदय शंकर मिश्र ने मिथिला एवं मैथिली की विकास यात्रा को रेखांकित करते हुए वाजपेयी जी को इसके विकास का पैरोकार बताया। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के सिनेट सदस्य डा राम सुभग चौधरी ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने नाम के अनुरूप विकट आंधी-तूफान जन्य परिस्थितियों से जूझ कर देश के मान-प्रतिष्ठा तथा संस्कृति की रक्षा की।
श्रद्धांजलि सभा का संचालन करते हुए संस्थान के मीडिया संयोजक प्रवीण कुमार झा ने मिथिला मैथिली के विकास में स्व वाजपेयी के योगदानों की विस्तार से चर्चा करते हुए उन्हें मिथिला-मैथिली का सच्चा हितैषी बताया। उन्होंने कहा कि अटल जी की सरकार ने करोड़ों मिथिलावासी के माँ की भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर एवं वर्षों से दो भाग में विभक्त होने का दंश झेल रहे मिथिला को एक करने का गौरवशाली उपहार प्रदान किया। अपने संबोधन में उन्होंने अटल के सपनों का मिथिला बनाने के लिए पृथक मिथिला राज्य के गठन को जरूरी बताया। प्रो चंद्रशेखर झा बूढाभाई ने स्व वाजपेयी को भारतीय दर्शन एवं सांस्कृतिक चेतना को समर्पित व्यक्तित्व बताते हुए मिथिला को सब कुछ देने की चाहत रखने वाला महान व्यक्ति बताया।

अध्यक्षीय संबोधन में डा बुचरू पासवान ने मातृभाषा मैथिली के प्रति मिथिला के लोगों में कम हो रहे भावनात्मक आकर्षण के प्रति चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि प्रतिभा के धनी इस क्षेत्र के लोगों को पढ़ाई, दवाई और कमाई के लिए आज भी पलायन करना पड़ रहा है, यह गंभीर चिंतन का विषय है। मौके पर डा गणेश कांत झा, हरिकिशोर चौधरी, डा राजकिशोर झा, प्रो चन्द्रमोहन झा, डा उदय कांत मिश्र, नवल किशोर झा, दुर्गानंद झा, आशीष चौधरी, डा सुषमा झा, मिथिलेश कुमार मिश्र आदि ने भी अपने विचार रखे। धन्यवाद ज्ञापन संस्थान के शोभायात्रा प्रभारी विनोद कुमार झा ने किया। सभा के अंत में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सहित झारखंड राज्य आंदोलन के प्रणेता शिबू सोरेन, सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक पद्मविभूषण डा बिन्देश्वर पाठक एवं बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के पूर्व सदस्य प्रो भरत लाल झा की पुण्य स्मृति में एक मिनट का मौन धारण किया गया।

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