जिमूतवाहन व्रत कथा : पुत्र रक्षण आ वंश वृद्धि लेल मैथिल परम्पराक विशेष व्रत
संकलन कर्ता :- सीता राम झा 9711114647, 9319975179
एक दिन कैलाशक अति रमणीय शिखर पर बैसल पार्वती शंकरजी सँ प्रश्न केलनि -ऐहेन कोन व्रत वा तपस्या छैक जकरा कयलासँ सौभाग्यवती स्त्रीक संतान जीवित रहतैक । शंकरजी कहलखिन – आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथिकऽ यदि स्त्री लोकनि पुत्रक कामनासँ शालिवाहन राजाक पुत्र जिमूवाहनक कुशक प्रतिमा बनाय कलशक जलमे स्थापना क कलशक चारूभाग खूव सुसज्जित कऽ’ ओहिठाम खाधि खुनि पोखरिक निर्माण कऽ एकटा पाकरिक टाढ़ि रोपि लाहि पर माटिक चिल्होरिक आकृति बना राखि आ नीचामे गीदरनीक आकृति बना दूनूक माथ पर सिन्दूर लगाय फूल , माला , अक्षत , धूप – दीप , नैवेद्य आदि सँ युका भ ‘ बाँसक पात पर पूजा कयलासँ वंशक वृद्धि होइत छैक । आ पुत्रक जतेक जे ग्रह चक्र रहैत छैक तकरा सँ मुक्ति भेटैत छैक आ संग – संग सब प्रकारक मनोरथ पुरैत छैक।
मैथिल परम्परानुसार सभप्रकारक धार्मिक कार्य , जिज्ञासा /प्रश्न लेल सम्पर्क करी
एहि पृथ्वी पर समुद्रक नजदीकमे नर्मदाक तट पर दक्षिण दिशा मे कनकावती नामक एकटा नगर छैक । ओहिठाम अनेको तरहक सेनासँ सुसज्जित मलयकेतु नामक राजा राज करैत छलाह । हुनके राज्यमे बाहुलुटा नामक मरूभूमि छलैक जकरा मध्य बाटे नर्मदा नदी बहत छल । ओकरे किनार पर एकटा अति विशाल पाकरिक गाछ छलैक । ओहि पाकरिक धोधरिमे एकटा गिदरनी निवास करैत छलीह आ डादि पर एकटा चिल्होरनी । बहुत दिनसँ संग रहलाक कारणे दूनूमे खूब मित्रता छल । ओहि नगरक निवासिनि महिला लोकनि ओहि गाछ लग आबि आसिन कृष्ण अष्टमी के जीमूतवाहनक पूजा का कथा वाचकसँ कथा सुनि अपन – अपन घर गेलीह । गिदरनी आ चिल्ल्होरिनी सेहो व्रत केने छलीह ।
इहो लोकनि अपन – अपन निवास पर गेलीह ।
ओहि दिन संध्या समयमे ओहि नगरक निवास कयनिहार जे नामी सेठ तकर एकमात्र पुत्रक मृत्यु भए गेलै । ओकर परिजन सभ नर्मदा कातमे आबि अग्नि संस्कार कए अपन – अपन घर जाइत गेलाह । ओहि अष्टमीक रातिमे टपाटप मेघ लागल छल जाहिसँ हाथ – हाथ नहि सुझैत छलैक । ओहि भयंकर अन्हारमे कखनो – कखनो जे बिजलौका लौकैत छलैक तकर इजोत मे ओहि मृतकक माँस देखि दिन भरिक जे उपासल गिदरनी तिनका धैर्य नहि राखल भेलनि । ओ गाछ पर जे चिल्होरि रहथिन तनिका सँ प्रश्न केलखिन कि हे बहिना जागल छह । पहिल वेर खुशी पूर्वक चिल्हो जबाब देलखिन जे जगले छी । एहि तरहें अनेक बेर रहि – रहि क ‘ पुछारी केलाक बाद चिल्हो सोचलनि हिनका उत्तर नहि देबाक चाही । अपनाके निद्राक वशीभूत भ ‘ जेबाक चाही । पुनः गिदरनिके जिज्ञासा पर जबाब नहि भेटलनि । तहन ओ सोचलनि बहिना शायद सूति रहली । बेर – बेर गिदरनीक जिज्ञासोपांत जबाब नहि भेटला पर ओ अपन धोधरिस निकलि नदी किनार गेलीह । ओहिठाम नदी से अपन मुंहमे पानि आनि चिताक आगि के मिझाओल तहन चितामे जे बाँचल मांसक टुकरी तकरा खण्ड – खण्ड काटि पेट भरि खेबो कयलनि आ अपना निवास स्थान में आनि राखियो देलनि । हिनकर सब कर्तव्य ठाड़ि पर बैसल चिल्होरि देखैत छलीह । आब प्रात : काल गिदरनी चिल्लोरिके उदास भ’कहलखिन हे प्रिय । पारणा करू आब पारणाक बेर भए गेलैक । हम स्त्रीगण लोकनिक द्वारा जे देल गेल अच्छत , अंकुरी आ नैवेद्य ताहि ल’क ‘ पारणा करैत छी अहूँ करू गऽ ।
तकरा बाद कालक्रमे प्रयागमे कुम्भ लगलै। चिल्होरि आ गिदरनी संयोग सँ दुनू गोटे ओतय गेलीह । ओहिठाम एके समयमे दुनूक मृत्यु भए गेलनि । कुम्भमे मृत्युक कारण गिदरनी आ चिल्होरनी दुनूक जन्म वेदक ज्ञाता जे भास्कर नामक भिक्षु ब्राह्मण तनिका घरमे भेलनि । दुनू गोटे जौआ जन्म लेलनि दुनक नामकरण भेल । चिल्होरि जे छलीह से जेठ भेलीह हुनकर नाम शिलावती छल आ गिदरनी छोट भेलीह हुनकर नाम कर्पूरावती राखल गेल। दुनू कालक्रमे पैघ भेलीह याने कन्यादानक योग्य मेलीह । तहन दुनूक कन्यादान भेल । पैघ शीलावती हुनकर विवाह माहमत्तम नामक जे महा धनीमनी लोक तकरा संग भेल आ दोसर कन्याक विवाह मलयकेतु नामक महाराज तनिका संग भेल। कालक्रमे कर्पूरावती गर्भवती भेलीह आ बच्चा जन्मो लेलकनि लेकिन बचलनि नहि , मरि गेलनि । एहि तरहें कर्पूरावतीके सात टा पुत्र जन्म लेलकनि आ सातो मरि गेलनि । ओ लोकनि परम दुःखी छलीह। जेठ जे कन्या शिलावती हुनको सात टा पुत्र जन्म लेलकनि आ सातो जीवित छलनि । शिलावतो के सेहो कर्पूरावतीक पुत्र सभक मृत्यु पर बड़ कष्ट होइत छलनि। कर्पूरावतीके तकलीफ छलनि एहि बातक जे शिलावतीक सतोटा पुत्र जीवित छलनि आ सेवा करैत छलनि से देखि कर्पूरावतीके बड़ संताप होइन ।
एहि दुःखसँ कर्पूरावती जिमूतवाहनक पूजा दिन खटवास लए लेलनि राजा जहन गृहवासमे अयलाह त s जिज्ञासा कयलनि जे रानी कतय छथि । तखन रानीक लगमे रहनिहारि जे चेरी लोकनि से जाय कर्पूरावतीक कहलखिन अहाँके महाराज तकैत छथि ।
रानी ओकरा सभक द्वारा सम्बाद देलनि जे कहुन जा कए जे सयनागारमे सूतल छथि । तखन राजा आवि प्रश्न केलखिन- ” प्रिय एना किएक सुतल छी । ” कर्पूरावती जबाब देलखिन – ‘ सुखे सुतल छी । ‘ तखन राजा कहलखिन- ” प्रिय उठू । ” कर्पूरावती ताहि पर कहलखिन- ” अहाँ यदि हमर कहल करब तऽ हम उठव नहि तहन नहि उठब । ” राजा जबाब देलनि- ” अवश्य करब । ” ताहि पर रानी राजा सँ तीन बेर सत करेलनि । सत केला पर कर्पूरावती ओछाओन में उठलीह आ कहलनि – हमर जे बहिन शिलावती तिनकर सातो पुत्रक गरदनि काटि हमरा मँगवा दिय । ताहि पर राजा पृथ्वी के ठोकैत कान धरैत कहैत छथि- ” पापिनि एहि तरहक बात आहाँ कियैक बजलहुँ । एहि तरहें बेरि बेरि कहलाक बाद कोनो प्रत्युत्तर नहि पाबि हुनकर आज्ञाके स्वीकार कयल । तहन राजा कहलनि काल्हि अहाँके सातो टा सिर अना कए दऽ देव । कर्पूरावतो हुनकर वचन के सत्य जानि जिमूतवाहनक पूजा कयलनि । तकरा बाद राजा अपन सत्तक रक्षाक हेतु चण्डालक बजा कहलनि- ” महामतक जे सातो पुत्र जकर गरदनि काटि कर्पूरावतीक देलक । सातो मुरोक देखि कपूरावती अति प्रसन्न भेलीह । कर्पूरावती ओ सातो रा मूरीके धो पीयर कपड़ामे बान्हि सात टा डालामे राखि दासी द्वारा शिलावतीक सातो पुतहुक पारणा लेल पठा देलखिन ।
शिलावती द्वारा नियमपूर्वक जिमूतवाहनक पूजाक कारणे ओ सातो डाला महक जे मूण्ड से तारक फल भ ‘ गेल आ सातो बालक जिवित भए गेलनि । ओ सातो बालक अपन घोड़ा पर चढ़ि अपन घर अयलाह । सातो भाय स्नान ध्यान कए अपन – अपन पत्नीक समीप पहुँचलाह । ओ सातो पुतह मौसी पठाओल गेल ताड़क फल अपन – अपन स्वामीक देखाय देलक आ कहलक ई अहाँक मौसी पारणा लेल पठौलनि अछि ।
ओमहर कर्पूरावती शिलावतीक सातो पुत्र वधुक शोकाकुल कानब सुनबाक जे आनन्द तकर प्रतीक्षामे बैसल छलीह । जहन कानब कर्पूरावती नहि सुनेलनि तखन जिज्ञासाक लेल पुन : दासीके पठौलनि । दासी ओहिठाम सँ आबि सब समाचार मलिकाइनिक सुनेलक । समाचार बुझि कर्पूरावती अति दुःखी भेलीह । तखन ओ राजासँ पुछलनि- “ हे महाराज ! काल्हि जे आहाँ शिलावतीक सोतो बेटाक सिर कटबा कर देने रही से ककरो दोसराक हेतैक ।
” राजा कहलखिन- ” प्रिये ! अहाँक सामनेमे ओ सातो मुण्ड राखल छल तहन अहाँ एहन किऐक कहैत छी ।
” रानी ताहि पर कहलनि- ” हमहूँ ओकरा सबके देखलियै तऽ आश्चर्य लागल । ओ सब पुनः कोना जिवीत भेल ।
” तहन राजा बजलाह- ” प्रिये ! अहाँक बहिन पूर्व जन्ममे सत व्रतक आचरण कएने छथि ओहि व्रतक प्रभावसँ हुनकर सातो पुत्र जीवित भए गेलनि । आहाँ ओहि सत व्रतक आचरण नहि केने छलहुँ तैं अहाँक सातो बालक मरि गेल आ ताहिसँ आहाँ अत्यन्त दु : खी रहैत छी । ”
राजाक मुँहसँ ई बात सुनि गुम भऽ कर्पूरावती ठाढ़ रहलीह । अगिला वर्ष कर्पूरावती महामत्तक जे स्त्री शिलावती हुनका दासी द्वारा सम्बाद पठौलनि आइ दुनू गोटे एके ठामे पूजा करब आ कथा सुनब । शिलावती दासी द्वारा सम्बाद पठेलखिन- ” कर्पूरावती महारानी छथि हुनका बुते ई पूजा करब आ कथा सुनब सम्भव नहि छनि । दासी ओतयस आबि रानीके कहलकनि । रानी दासीके कहलनि हुनका सात गोट बालक छनि ताहि गुमान सँ चूर छथि । कर्पूरावती प्रात : काल संग – संग पारणा करब ताहि लेल दासीके पठौलनि । दासी पुनः वापस आवि कहलकनि- ” ओ कहलनि हम दुनू गोटे एक संग पारणा नहि क ‘ सकैत छी । ई सुनि रानीके क्रोधक ठेकान नहि रहलनि । ओ खरखरिया मँगाय ओहि पर चढ़ि पारणाक जावन्तो सामिग्री लय शिलावतीक ओहिठाम पाँच गेलीह । ओहिठाम पहुँचलाक बाद शिलावती आदरक संग पानि लय पैर धोआ आसन पर बैसेलखिन आ पुछलखिन- ” बहिन एहिठाम आहाँ कोना पहुँचलहुँ ? कर्पूरावती कहलनि आहाँक संग मिलि हम पारणा करक लेल आयल छी । तहन शिलावती कहलनि- ” हम आहाँ संग एकठाम पारणा नहि करब । आहाँ राजाक जे राज्य भोग से करू आ आबो दुष्टता छोरू । कर्पूरावती तैयो थेथर जकाँ कहलनि- ” आइ हम आहाँक संग मिलिये कए पारणा करब । ” शिलावती ओहि वचनके बुझि जे आव ई मानय बला नहि अछि पारणाक ओरिओनमे लागि गेलीह । आव आहाँ हमरा संग मिलि अवश्य पारणा करू । तहन कहलखिन जे पहिने आहाँ हमरा संग नर्मदाक तीर पर चलू । दुनू गोटे ओतय विदा भेलीह । शिलावती आ कर्पूरावती दुनू मिलि क स्नान कयलनि स्नानोपरांत शिलावती कर्पूरावती सँ प्रश्न कयलनि , कि आहाँके पूर्व जन्मक बात स्मरण अछिओ ? कर्पूरावती कहल नहि स्मरण अछि । तहन शिलावती कहय लगलखिन- ” यैह नर्मदा नदी अछि । यैह बाहुलुटा मरूभूति छैक । यैह विशाल पाकरिक गाछ अछि । पूर्व जन्ममे हम चिल्होरि छलहुँ आ आहाँ गिदरनो । एहि पाकरीक धोधरिमे आहाँ निवास करैत छलहुँ आ डारि पर हम ।
एहि ठामक नगर निवासिनी स्त्रीगण लोकनि आबि जिमूतवाहनक पूजा कयलनि आ कथा सुनलनि । हम आ आहाँ दुनू गोटे व्रत केने रही । हुनके सभक लगमे जा हमहुँ दुनू गोटे कथा सुनलहुँ । कथा सुनलाक बाद अपन – अपन निवास स्थानमें जा कर रहलहुँ । ओही दिन एहि नगरक जे दन्ता सेठ तकर पुत्रक देहावसान भऽ गेल छलैक । ओ अपन बन्धु बान्धवक संग आबि चिता रचि संस्कार दय चलि गेल तकर बाद मध्य रातिमे आहाँ हमरासँ प्रश्न कयलहुँ प्रिय चुल्हो आहाँ जागल छो कि सुतल । कैएक वेर आहाँ जिज्ञासा केला पर हम चुप्पी लगा देलहुँ । तहन हमरा आहाँ सुतल बूझि अपन धोधरिस बाहर भय नदीस मुँहमे पानि आनि चिताक अग्निक मिझा भरि पेट माँस खेलहुँ आ किछु आनि प्रात : काल पारणा लेल रखलहुँ । प्रात : काल पारणा लेल हमरा आहाँ कहलहुँ । प्रिये ! चिल्हो पारणा नहि करब ? तहन हम जे आहाँक रातुक बृतांत देखने रही तैं उदास हृदय कहलहुँ हे सखी आहाँ करू , हम कयलहुँ । तहन हम ग्रामीण महिला लोकनि द्वारा देल गेल अच्छत आ अँकुरी लऽ पारणा कयलहुँ । आहाँ रातुक जे नर मांस रखने छलहुँ तकरा लऽ कऽ पारणा कयलहुँ । ई सब वृतांत हमरा ज्ञात अछि आबि कए देखू ई कहि हुनका पकरि धोधरिमे लऽ जा नर मांसक हड्डी आ शेषांस कर्पूरावतीके शिलावती देखओलनि । ” तहन कर्पूरावतीके शिलावती कहलनि- ” व्रतभंगत दोषसँ आहाँक पुत्र सब मरैत गेल आ आहाँ – दु : खी होइत गेलहुँ । हम नियमपूर्वक व्रतक पालन कएल तकर फल जे पुत्र सब जीवित अछि आ प्रसन्न छी आ एही कारणसं हमरा आहाँमे बिरोधाभास अछि । कर्पूरावती पूर्व जन्मक वृतांत शिलावतीक मुँह सुनि ओही ठाम अपन शरीर त्याग कए देलनि ।
मैथिल परम्परानुसार सभप्रकारक धार्मिक कार्य , जिज्ञासा /प्रश्न लेल सम्पर्क करी
” शिलावती ओतयसँ घुमि घर अयलीह । तखन राजा अपन पत्नीक श्राद्ध का निश्चिन्त भए राज्य चलबय लगलाह । वैह जिमूतवाहनक पूजा आइ तक मृत्युभुवनमे लोक करैत आबि रहल अछि । एहि व्रतके नियमानुसार कयनिहारि सब तरहें भरल पुरल रहैत छथि ।

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