तीन से पांच नवम्बर तक होगा तीन दिवसीय आयोजन, बहेगी साहित्य, संगीत व कला की त्रिवेणी
मिथिला के महान विभूतियों को यथोचित सम्मान प्रदान करते हुए आने वाली पीढ़ी को उनके कृतित्व से रूबरू कराने के उद्देश्य से प्रति वर्ष साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महाकुंभ के रूप में मिथिला विभूति पर्व समारोह का आयोजन मिथिला-मैथिली के उत्कर्ष का जीवंत प्रतीक है। यह बात विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव डा बैद्यनाथ चौधरी बैजू ने रविवार को 53वें मिथिला विभूति पर्व समारोह के आयोजन समिति की समीक्षा बैठक में कही। उन्होंने कहा कि इस वर्ष समारोह के दौरान मिथिला की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए उपयुक्त माहौल तैयार करने के साथ ही मैथिली भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने एवं मिथिला के सर्वांगीण विकास के एजेंडा को चुनावी साल में विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्र में शामिल कराने पर विशेष जोर रहेगा। उन्होंने बताया कि बैठक में इस वर्ष भी मिथिला पेंटिंग व व्यंजन प्रदर्शनी के साथ ही साहित्य अकादमी, दिल्ली व मैथिली अकादमी, पटना के सौजन्य से आकर्षक पुस्तक मेला का आयोजन लगातार तीनों दिनों तक किए जाने पर सहमति बनी।
उन्होंने बताया कि इस ऐतिहासिक आयोजन में नई पीढ़ी के कलाकारों एवं कवियों को अधिक अवसर प्रदान किए जाने पर विशेष जोर दिए जाने का निर्णय लिया गया। जबकि इस बार समारोह के पहले एवं दूसरे दिन विद्यापति गीत-संगीत पर विशेष फोकस रहेगा।
बैठक में मीडिया संयोजक प्रवीण कुमार झा ने बताया कि समारोह में संस्थान की मुख पत्रिका ‘अर्पण’ के प्रकाशन को लेकर संपादक डा महेंद्र नारायण राम व उनके संयुक्त संपादन में आलेख संग्रहण का कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है। जबकि लेखक रमेश के संयोजन में कवि सम्मेलन को भव्य बनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से मैथिली के स्वनामधन्य कवियों एवं कवियित्री की सूची को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
शोभा यात्रा संयोजक विनोद कुमार झा एवं सह संयोजक प्रो विजय कांत झा ने 53वें समारोह की शोभायात्रा की चल रही तैयारी के बारे में अवगत कराया। आशीष चौधरी ने कार्यक्रम से युवाओं को सीधे जोड़़ने के लिए उनके संयोजन में चल रही तैयारियों की जानकारी दी। मणिभूषण राजू ने अंतरराष्ट्रीय मिथिला पेंटिंग प्रतियोगिता के बारे में विस्तार से बताया।
मैथिली अकादमी के पूर्व अध्यक्ष पं कमला कांत झा ने कहा कि जनक, जानकी और कवि कोकिल विद्यापति की भाषा मैथिली को शास्त्रीय भाषा के रूप में शामिल नहीं किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। केंद्र सरकार का यह फैसला उनके कथनी और करनी में असमानता को दर्शाता है। शास्त्रीय भाषा के रूप में मैथिली के शामिल होने से न सिर्फ मिथिला एवं बिहार की भाषाई विरासत सम्मानित होगी, बल्कि मैथिली भाषा के प्राचीन ग्रंथों में निहित गूढ़ ज्ञान से पूरी दुनिया को सहज ही अवगत कराया जा सकेगा।
अध्यक्षीय संबोधन में संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डा बुचरू पासवान ने कहा कि शास्त्रीय भाषा के रूप में मैथिली को दर्जा दिए जाने संबंधी सभी आवश्यक पहलुओं से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट केंद्र सरकार के पटल पर विहित प्रक्रिया के तहत राज्य सरकार द्वारा रखे जाने के बावजूद मैथिली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया जाना आश्चर्यजनक है। उन्होंने करोड़ों मिथिलावासी की अस्मिता और मैथिली भाषा साहित्य के उत्तरोत्तर विकास से जुड़े इस मामले पर सभी मैथिली सेवी संगठन से एक मंच पर आकर चुनावी साल में अपने पक्ष में एकजुटता का बेहतर माहौल बनाने का आह्वान किया।बैठक में पूर्व प्रधानाचार्य प्रो अनिल कुमार झा के संयोजन में मिथिला के विकास से संबंधित विस्तृत एजेंडा तैयार करने के लिए चार सदस्यीय कमिटी गठित की गई। इस कमिटी में उनके अतिरिक्त पूर्व प्रधानाचार्य डा विद्यानाथ झा, वैद्य गणपति झा एवं प्रवीण कुमार झा शामिल किए गये। बैठक में प्रो प्रकाश चन्द्र मिश्र, अमर नाथ चौधरी, प्रो चंद्रशेखर झा बूढ़ाभाई, डा उदय कांत मिश्र, पुष्पा कुमारी, डा महानंद ठाकुर, मिथिलेश मिश्र आदि ने भी अपने महत्वपूर्ण विचार रखे।

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