मधुबनी जिले के हरलाखी थाना में पदस्थापित एएसआई प्रमोद कुमार और चौकीदार अजय कुमार द्वारा रिश्वत लेते हुए वीडियो सामने लाने वाले पत्रकार हरि शम्भू शर्मा को प्रताड़ित किए जाने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया है। पत्रकार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति संदीप कुमार की एकल पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि मधुबनी के पुलिस अधीक्षक योगेंद्र कुमार के माध्यम से पूरे प्रकरण की गहराई से जांच कराकर हलफनामा प्रस्तुत किया जाए।पत्रकार हरि शम्भू शर्मा ने याचिका में स्पष्ट रूप से आरोप लगाया है कि उन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए पुलिसकर्मियों की रिश्वतखोरी का वीडियो बनाकर उसे सार्वजनिक किया। यह वीडियो हरलाखी थाना क्षेत्र के ही एक मामले से जुड़ा हुआ था, जिसमें थाने के एएसआई प्रमोद कुमार और चौकीदार अजय कुमार कथित रूप से एक मामले के निपटारे के बदले रिश्वत ले रहे थे। इस वीडियो के सामने आने के बाद प्रशासनिक और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि इस खुलासे के बाद दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय, पत्रकार हरि शम्भू को ही लगातार परेशान किया जाने लगा। याचिका में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित पुलिसकर्मियों ने बदले की भावना से उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, डराया धमकाया और यहां तक कि उनकी पत्रकारिता पर सवाल उठाए गए। उन्होंने कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी प्रतिवादी बनाया है, जिन पर या तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन्हें प्रताड़ित करने का आरोप है।
कोर्ट का निर्देश निष्पक्ष जांच कराएं, दोषी पाए जाने पर कार्रवाई करें
दिनांक 4 अगस्त 2025 को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप कुमार की बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा कि पत्रकारिता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है और यदि कोई पत्रकार भ्रष्टाचार को उजागर करता है, तो उसे सुरक्षा और संरक्षण मिलना चाहिए, न कि उत्पीड़न का शिकार होना चाहिए। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि मधुबनी के एसपी स्वयं इस मामले की बिंदुवार जांच करें और यह सुनिश्चित करें कि याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच हो। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जांच में यह साबित होता है कि संबंधित पुलिसकर्मियों ने पत्रकार को जानबूझकर प्रताड़ित किया, तो उनके विरुद्ध सख्त अनुशासनात्मक व विधिसम्मत कार्रवाई की जाए।
हरि शम्भू शर्मा ने न्यायालय में बताया कि उनके खिलाफ बदले की भावना से झूठे आरोप भी लगाने की कोशिश की गई, ताकि उन्हें चुप कराया जा सके। उन्होंने कोर्ट से न्याय की गुहार लगाते हुए कहा कि वे केवल अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे, लेकिन पुलिस तंत्र द्वारा उन्हें अपराधी की तरह पेश किया गया।
चार सप्ताह में मांगी गई रिपोर्ट, अगली सुनवाई के बाद तय होगी अगली कारवाई
हाईकोर्ट ने पूरे मामले की जांच रिपोर्ट चार सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है और अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है। अब सबकी निगाहें इस रिपोर्ट पर टिकी हैं कि क्या पत्रकार के आरोप सही साबित होंगे और क्या पुलिस विभाग दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगा। यह मामला एक बार फिर इस सवाल को जन्म देता है कि क्या भ्रष्टाचार उजागर करने वाले पत्रकारों को सुरक्षा मिलेगी या वे हमेशा प्रताड़ना का शिकार होते रहेंगे। न्यायपालिका का यह हस्तक्षेप ऐसे समय में उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है।

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