लक्ष्मी दीक्षित, ग्वालियर
(नेशनल जर्नलिस्ट एसोसिएशन)
इस बार मौसम विभाग का पूर्व अनुमान था कि ग्वालियर में मानसून अच्छा रहेगा और झमाझम बारिश हो भी रही थी। इसी झमाझम बारिश का लुत्फ़ उठाते हुए चाय पकौड़े का आनंद ले ही रही थी की समाचारों का चैनल लगाया जिस पर हैडलाइन आ रही थी हाथरस वाले कांड की। अभी पिछले सप्ताह ही एक बाबा सॉरी कथावाचक के विवाद से निपटे ही थे कि एक नया बाबा और एक नया कांड।अपना सिर धुन लिया मैंने। प्रथम दृष्टया नाम पढ़ा भोले बाबा तो लगा हमारे अविनाशी आदियोगी अजर अमर शिव जी ने नया अवतार ले लिया है और उनके लाखों अनुयाई भी हैं; और मुझे अभी तक पता ही नहीं था। फिर होश आया। अपनी धार्मिक बुद्धि के वेग को रोका और रोकते कैसे नहीं। यह जो भोले बाबा थे वह हमारे महादेव नहीं हैं। वे तो कभी अवतार लेते ही नहीं हैं। यह एक शेर के चोगे में सियार थे जो अपने मानवतावादी उपदेशों के मकड़जाल में न जाने कितने भोले-भाले लोगों की मेहनत की कमाई को दान और सेवा के रूप में डायरेक्टली या इनडायरेक्टली लेकर अपना धंधा चलाते हैं।
पहले तो इतने सारे बाबाओं के नाम भी नहीं सुने थे पर धन्य है यह बाबा और उनके कारनामे जो रोज समाचारों और टीवी चैनलों की हेडलाइन बनकर छाए रहते हैं।वह कहते हैं ना खुद खाओ और दूसरे को भी खाने दो। तभी तो यह बाबा लोग स्वयं भी इनकम जनरेट कर रहे हैं और टीवी चैनलों की टीआरपी भी इंक्रीज कर रहे हैं।उनको भी समृद्ध बना रहे हैं। कितने दयालु होते हैं यह बाबा लोग जो अपने भक्तों को जो उनके प्रवचनों को सुनने आते हैं अजीबोगरीब टोटके बताकर कर्म सिद्धांत का बेड़ा गर्क करते रहते हैं। अगर न्यूटन आज जीवित होता तो बेलपत्र पर हनी लगाकर शिवलिंग पर चिपकाने से, बिना पढ़ाई किए पास हो जाने वाले टोटके पर, जरूर भौतिकी का एक नया सिद्धांत प्रतिपादित कर देता।और जब टोटके को करके हजारों छात्र फेल हो जाते तो थॉमस एंडर्सन कहता- मैं फेल नहीं हुआ। मैंने एक और तरीका ढूंढ लिया है जिससे पास नहीं हो सकते।
फिर मैं सोचती हूं क्या हमारे देश के लोग सच में इतनी जाहिल हैं जो 21वीं सदी में भी इन बाबाओ के तथाकथित मानवतावाद को सच मानते हैं जो आलीशान कोठियों में सारे ऐश्वर्या, वैभव के साथ जीवन यापन करते हैं। संयम, त्याग, समर्पण उनके निजी जीवन में जरा भी दृष्टिगोचर नहीं होते। मेरे विचार में यह जो लोगों की भीड़ जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक होती है ऐसा नहीं है कि इतने भोले भाले हैं। मतलब कहते हैं ना पानी से पापा और रोटी से आटा कहने वाले तो नहीं होते। नैसर्गिक बुद्धि और सही गलत की समझ प्रकृति ने हर मानव को दी है। लेकिन मनुष्यों में बिना कार्य, परिश्रम किये और अपनी क्षमता और काबिलियत से अधिक चमत्कार से सब कुछ पाने की जो सोच और उतावलापन है; यही कारण है आजकल इन बाबाओ के पास बढ़ती भीड़ों का। महिलाएं इन बाबाओ के मकड़जाल में इसलिए ज्यादा फंसती हैं क्योंकि महिलाएं भाव जगत में अधिक विचरण करती हैं। अगर किसी बाबा के पैर छू लेने से चमत्कार से ऑटोमेटिक इच्छाएं पूरी हो जातीं या फिर कर्म बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती तो भगवान स्वयं इस धरा धाम पर अवतरित होकर मानव जाति को कर्म के सिद्धांत का महत्व ना समझाते। न गीता का उपदेश होता और न महाभारत का युद्ध।

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